Thursday, July 2, 2015

अब मुझे किसी से प्रीत नहीं
जीवन का कोई गीत नहीं
टूट  गए वीणा के तार
अब शेष कोई संगीत नहीं

सब खोया हैं क्या पाया है
अपनों ने रंग दिखलाया हैं
ठगा गया है ऐसा मन
अब निभती कोई रीत नहीं

जाने क्या क्या कर जाते हैं
दुनियां को राह दिखाते हैं
फिर भी आदर्शो कि जग में
सदा हार हुई हैं जीत नहीं

अब मुझे किसी से प्रीत नहीं
अब मुझे किसी से प्रीत नहीं

जीवन भर नहीं पाते हैं
लुटा के सब कुछ जाते हैं
जब प्राण पखेरू उड़ जाएँ
शिलालेखों पे जी जाते है

इसीलिए मुझको यारों
ये दुनियां अब नहीं भाती हैं
छोड़ कर देव पुरुषों को जो
असुरों के पग लग जाती

तभी मैं हर क्षण कहता हूँ
बस खुद में सिमटा रहता हूँ
कि मुझे किसी से प्रीत नहीं
अब मुझे किसी से प्रीत नहीं

जय श्री कृष्ण

नरेश मधुकर

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