Thursday, July 2, 2015

जायें क्यूँ ...

निखरें  सँवरें  सपने सजायें
तुम ही बताओ अब हम क्यूँ
आओगे तुम न वापस मुड़कर
फिर हम जीते ही जायें क्यूँ

दुनियाँ वहम सी लगने लगी है
रात कफन सी लगने लगी है
तेरी गली जब आ ही गये हैं
अब हम  जन्नत  जायें क्यूँ

कितने साहिल कितने सागर
और न जाने  कितने सुकून
ले बैठे हैं हम तो खुद ही को
किस किस को समझायें कयूँ

जी लूँ तेरे संग क़िस्मत नहीं हैं
मुक़्क़द्दर में तेरी सोहबत नहीं हैं
जिस आज का कोई कल ही नहीं है
उसको कल तक लाएं क्यों  ...

नरेश मधुकर ©

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