Tuesday, June 17, 2014

दो पल

दो पल मिले थे प्यार के हंस कर गुज़ार दिए
इन दो पलों ने लेकिन  सपने हज़ार दिए

सूरज डूब गया तो साया भी चला गया
बुरे वक्त ने मधुकर कई चश्में उतार दिए

संभल सका न हमसे ख़ुद अपना ही नशा
उस पर यारों ने हमको अपने ख़ुमार दिए

यक़ीन न हो तो पूछो जलती शमां से तुम
सजी महफ़िलों ने अक्सर सूने दयार दिए

किस किस से करते हम वफाओं का हिसाब
जिसने जो गम देने थे  वो सरे बाज़ार दिए 

नरेश मधुकर
©2014

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