Friday, June 20, 2014

मचा है चारो तरफ कैसा ग़दर यारों

मचा हैं  चारों तरफ   कैसा ग़दर यारों
नहीं लगता  यह पहले सा शहर यारों 

तिशनगी ऐ सियासत लहू से भी न बुझी 
सूखने को है  अब यह  सुर्ख समंदर यारों

आजकल दिन भूखे और शामें कातिल
शुक्रे खुदा जो  बेटी आ जाये घर यारों

रात सरहद पर कट गए सैकड़ों बेटे
वापस लाने है  उनके भी सर यारों

जाने किस बेवजह झगडे में मधुकर 
मेरे मुल्क को लग गयी है नज़र यारों

नरेश मधुकर
©2014

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