मैं भटकता ही फिरा हूँ रहगुज़र से रहगुज़र
आशियाँ को मेरे जाने लग गयी किसकी नज़र
राहे वीराना भटकते मिल गयी ख्वाईशें दो चार
निकल पड़ा मैं साथ उनके ढूँढने अपनी डगर
अय आसमां ऐ बुलंदी तेरी हैं औकात क्या
लांघ देते तुझको भी गर काटता न वक़्त पर
इन दरकती दीवारों का गम ज़माना क्यूँ करे
टूट कर बिखरा है जो वो तेरा घर वो मेरा घर
बेच कर गैरत जीए तो मधुकर क्या जीए
कट सके तो काट डालो अब नहीं झुकता ये सर
नरेश मधुकर
©2014
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