Wednesday, March 19, 2014

जाता नहीं

अश्क बारिश में छिपाकर  कोई मुस्कराता नहीं
हर किसी को  मधुकर  यह हुनर  आता नहीं

हैं नहीं आसान  इस दौर के  बन कर रहें
अपनी सलीबें काँधे पर कोई उठा पाता नहीं

जितने काँधे  उतने सर  अब दिखाई देते नहीं
कट जातें हैं सर जो इन्हें खुद झुका पाता नहीं

भूखे बच्चें  जलती बस्ती  और चंद कच्चे मकान
इनके सिवा अब शहर कुछ और दिखा पाता नहीं

ऐसे जलतें  मंज़रों से  गुज़र कर  आये हैं हम
इतनी आसानी से हम को कोई सता पाता नहीं

बीती मुद्दत जा चुके सब छोडकर मेरा मुकाम
उनका दिया दर्द कमबख्त अब तलक जाता नहीं ...

नरेश मधुकर
copyright © 2014

No comments:

Post a Comment