Friday, March 14, 2014

ख्वाईश

जब ख्वाईश ख़्वाबों के सांचे में ढल जाती है 
खुशनुमा ज़िंदगी अक्सर बदल जाती है 

दौड़ मोहब्बत की जीत पाना मुश्किल हैं
हकीकत हसरत से आगे निकल जाती है 

ये दिलवालों का शहर है दिमाग्वालों हैरान मत हो 
यहाँ सिक्के नहीं प्यार की कौड़ियाँ भी चल जाती हैं 

नहीं मुमकिन यह तपिश थामे रखना अय दोस्त 
ऐसी कोशिशों में उंगलियाँ जल जाती हैं 

न देखो मुड़कर मेरी परवाह न करो मधुकर 
वफाएं मेरी अक्सर खता खाकर संभल जाती है

नरेश मधुकर  
© 2013




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