Monday, April 21, 2014

दरिया

आते आते तिरे दर तक भटक गया दरिया
तिरी खुशबू से  जैसे  महक गया दरिया

कौन कहता हैं उल्फत सिर्फ इन्सा को होती है
मौजों की मोहब्बत में  बहक गया दरिया

वो तिरा आना लिपट कर फिर चले जाना
तपती रेत सा मुट्ठी से सरक गया दरिया

वो मस्त हवा,कातिल मंज़र वो आँखें नम
तिरे संग संग जैसे  सिसक गया दरिया

क्या फर्क हो मयखाना या बुतखाना मधुकर  
इनकी हदों  तक आकर  छलक गया दरिया 

मिल के बिछड़े थे जिस मोड पे मुद्दतों पहले 
उसी मंज़र पे  जैसे  अटक गया दरिया ...

नरेश मधुकर © 2014



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