आते आते तिरे दर तक भटक गया दरिया
तिरी खुशबू से जैसे महक गया दरिया
कौन कहता हैं उल्फत सिर्फ इन्सा को होती है
मौजों की मोहब्बत में बहक गया दरिया
वो तिरा आना लिपट कर फिर चले जाना
तपती रेत सा मुट्ठी से सरक गया दरिया
वो मस्त हवा,कातिल मंज़र वो आँखें नम
तिरे संग संग जैसे सिसक गया दरिया
क्या फर्क हो मयखाना या बुतखाना मधुकर
इनकी हदों तक आकर छलक गया दरिया
मिल के बिछड़े थे जिस मोड पे मुद्दतों पहले
उसी मंज़र पे जैसे अटक गया दरिया ...
नरेश मधुकर © 2014
तिरी खुशबू से जैसे महक गया दरिया
कौन कहता हैं उल्फत सिर्फ इन्सा को होती है
मौजों की मोहब्बत में बहक गया दरिया
वो तिरा आना लिपट कर फिर चले जाना
तपती रेत सा मुट्ठी से सरक गया दरिया
वो मस्त हवा,कातिल मंज़र वो आँखें नम
तिरे संग संग जैसे सिसक गया दरिया
क्या फर्क हो मयखाना या बुतखाना मधुकर
इनकी हदों तक आकर छलक गया दरिया
मिल के बिछड़े थे जिस मोड पे मुद्दतों पहले
उसी मंज़र पे जैसे अटक गया दरिया ...
नरेश मधुकर © 2014
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