Wednesday, April 1, 2015

वो हाथ हमसे छुड़ा रहा था ...

वो अपना क़िस्सा सुना रहा था
मैं अपनी उलफत छिपा रहा था

मुँह मुझ से आज फेर कर खड़ा है
कभी जो मुझसे जुड़ा रहा था

मैं देखता हूँ उसे नजरों से गिरते
वो ख़ुद की फ़ितरत बता रहा था
 
वो उस मोड़ तक कभी न आया
मैं जिस मोड़ पर खड़ा रहा था

छोड़ आये दुनियाँ हम जिसकी ख़ातिर
वो हाथ हमसे छुड़ा रहा था ...

नरेश मधुकर ©

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